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भरुच आर्य समाज के १२५ वें स्थापना दिन पर आयोजित कार्यक्रम - वेद कथा एवं महर्षि दयानन्द जी का योगदान

● भरुच आर्य समाज के १२५ वें स्थापना दिन पर आयोजित वेद कथा ●
 
● स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, आचार्य श्री ब्र० ईश्वरानन्द तथा श्री हसमुख भाई परमार के प्रभावोत्पादक व्याख्यान ●

भरुच आर्य समाज के १२५ वें स्थापना दिन पर आयोजित दो दिवसीय (दि० ११ तथा १२ जून २०१७) कार्यक्रम में उपरोक्त तीन महानुभावों को आमन्त्रित किया गया था ।
 
नर्मदानगर (भरुच) स्थित जीएनएफसी कम्पनी की सुरम्य टाउनशिप के एक विशाल सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम की आमन्त्रण पत्रिका में ही यजुर्वेद के अन्तिम अर्थात् ४०वें अध्याय के महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत भाष्य का गुजराती अनुवाद सम्मिलित कर प्रकाशित किया गया था । कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ के निदेशक श्री स्वामी विवेकानन्द जी परिव्राजक ने अपने वेद कथा सत्र में इसी यजुर्वेदीय अध्याय के प्रारम्भिक मन्त्रों की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की । उन्होंने इसी मन्त्रों के माध्यम से ईश्वर-जीव-प्रकृति – इन तीन अनादि सत्ताओं का उत्तम ढंग से प्रतिपादन किया और शुभ-अशुभ-मिश्रित तथा निष्काम – इन चार प्रकार के कर्मों तथा कर्मफल व्यवस्था की विशद चर्चा कर मोक्ष के लिए शुभ कर्मों को निष्काम भाव से करना अनिवार्य बताया । आपने अपनी सरल एवं तार्किक शैली में महर्षि दयानन्द प्रतिपादित मोक्ष प्राप्ति के वैदिक दर्शन को अत्यन्त सरल तथा रोचक ढंग से समझाने का प्रशंसनीय प्रयास किया और अनेक श्रोताओं की शंकाओं के समाधान प्रस्तुत किए । आपने ईश्वर के वैदिक स्वरूप की व्याख्या कर सच्चे ईश्वर को जानने के लिए, मोक्ष प्राप्ति के लिए योगाभ्यास को अनिवार्य बताया । आपने सांसारिक सुख एवं सुख साधनों की मर्यादाएं बताईं और सभी प्रकार के दुःखों से छूटकर, ईश्वर के उत्कृष्ट आनन्द की प्राप्ति के लिए योग की शरण में जाने की प्रेरणा दी । वेद कथा का यह आयोजन आपके दार्शनिक व्याख्यानों के कारण अत्यन्त सार्थक रहे । 
 
वेद कथा के दोनों सत्र के आरम्भ में प्रथम व्याख्यान श्री ब्र० ईश्वरानन्द जी दर्शनाचार्य के होते रहे । आप दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ के स्नातक हैं । आपकी व्याख्यान शैली पर्याप्त रसप्रद और प्रभावशाली है । आप विचार पूर्वक एवं सुमधुर बोलते हैं और आवश्यकता अनुसार वेद आदि ग्रन्थों के प्रमाण वाक्य उपस्थित कर सुन्दरता से प्रस्तुत करते हैं । आपने वेदों का ईश्वरीय स्वरूप तथा उनकी महत्ता तथा ईश्वर के सर्वोच्च महत्त्व को बताकर श्रोताओं को लाभान्वित किया और कुछ समय श्रोताओं को जप आदि के माध्यम से परमात्मा का ध्यान कैसे किया जाता है, इसका प्रशिक्षण भी दिया । 
 
दूसरे दिन के सत्र का विषय था – महर्षि दयानन्द जी का योगदान । इस सत्र का प्रारम्भ गुजरात प्रान्तीय आर्य प्रतिनिधि सभा के महामन्त्री तथा आर्य समाज टंकारा के मन्त्री श्री हसमुख भाई परमार के वक्तव्य से हुआ । आपने गुजराती भाषा में महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज विषयक अनेक महत्त्वपूर्ण बातें प्रस्तुत कीं । आपने अपने व्याख्यान में महर्षि दयानन्द जी तथा आर्य समाज की विचारधारा के वैशिष्ट्य का भावपूर्ण तथा सशक्त शैली में वर्णन किया और आर्य समाज के प्रचार प्रसार के लिए श्रोताओं को प्रोत्साहित किया । 
 
तत्पश्चात् श्री ब्र० ईश्वरानन्द जी तथा स्वामी विवेकानन्द जी ने भी इसी विषय पर अपने अमूल्य विचार रखें  तथा महर्षि जी के विभिन्न अवदानों की चर्चा करते हुए फलित ज्योतिष आदि मिथ्या विश्वासों की तार्किक समालोचना की । 
 
स्वामी विवेकानन्द जी ने वेदों की सच्ची व्याख्या या भाष्य को लेकर महर्षि के अनन्य योगदान की चर्चा की । आपने बताया कि योगाभ्यास से प्राप्त किए गए विशेष आध्यात्मिक सामर्थ्य के कारण ही महर्षि जी वेदों को यथार्थ रूप में समझ पाए और उनकी सत्य व्याख्या प्रस्तुत कर सके थे । आपने इस प्रसंग में यह भी बताया कि आदि शंकराचार्य जैसे कई महानुभाव संस्कृतज्ञ तो थे, शास्त्रवित् भी थे, तार्किक तथा शास्त्रार्थ पटु भी थे; परन्तु योगज ऐश्वर्य सम्पन्न न होने से वे वेदों को अथवा वैदिक तत्त्वज्ञान को सच्चे रूप में प्रतिपादित करने में सफल न रहे और अद्वैतवाद (अर्थात् जीव तथा ब्रह्म अभिन्न हैं और जगत् मिथ्या या स्वप्नवत् है) जैसे अवैदिक वाद को प्रचारित कर गए । इसी व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश की स्तुति करते हुए तथा उसे उत्तम ग्रन्थ बताते हुए उसके अध्ययन करने को अत्यावश्यक बताया ।
 
इस कार्यक्रम का संचालन आर्य समाज भरुच के संस्कृतज्ञ युवा सदस्य श्री परेश जी कटारिया ने किया । आर्य समाज भरुच ने उपस्थित श्रोताओं में वैदिक साहित्य का उदारता पूर्वक वितरण किया । 
 
[प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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