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दर्शन योग महाविद्यालय

दर्शन योग महाविद्यालय की स्थापना चैत्र शुक्ला प्रतिपदा विक्रम संवत् २०४३ (१०अप्रैल१९८६) को श्री स्वामी सत्यपति जी परिव्राजक द्वारा हुई । वर्तमान में स्वामी विवेकानंद परिव्राजक (निदेशक),स्वामी ब्रहमविदानन्द सरस्वती (आचार्य),स्वामी ध्रुवदेव परिव्राजक (कार्यकारी आचार्य),आचार्य प्रियेश (उपाचार्य),आचार्य ईश्वरानंद (कार्यकारी उपाचार्य),आचार्य दिनेश कुमार (व्यवस्थापक) के पद पर कार्यरत है ।

उद्देश्य

1.   महर्षि पतंजलि प्रणीत अष्टांगयोग की पद्धति से उच्च स्तर के योग-प्रशिक्षकों तैयार करना,जो देश-विदेश में प्रचलित मिथ्यायोग के स्थान पर सत्य योग का प्रशिक्षण दे सकें ।

2.   विशिष्ट योग्यता वाले वैदिक-दार्शनिक विद्वानों का निर्माण करना,जो सार्वभौमिक अकाट्य युक्तियुक्त,वैज्ञानिक शाश्वत वैदिक सिद्धांतों का बुद्धिजीवी वर्ग के समक्ष प्रभाव-पूर्ण शैली से प्रतिपादन करके उनकी नास्तिकता मिटाकर उन्हें वैदिक-धर्मानुयायी         बना सकें ।

3.   निष्काम भावना से युक्त,मनसा,वाचा,कर्मणा एक होकर तन,मन और धन से सम्पूर्ण जीवन की आहुति देने वाले व्यक्तियों का निर्माण करना,जो अपनी और संसार की अविद्या,अधर्म तथा दुःखों का नाश करके उसके स्थान पर विद्या,धर्म तथा आनन्द की स्थापना कर सकें ।

प्रवेश के लिए योग्यता

1.   प्रवेश केवल ब्रह्मचारियों के लिए (आजीवन ब्रह्मचारियों को प्राथमिकता)

2.   वैदिक सिद्धांतों में निष्ठा होना ।

3.   योगाभ्यास तथा दर्शनों के अध्ययन में रुचि होना ।

4.   संस्कृत भाषा पढ़ने लिखने बोलने में समर्थ होना । (व्याकरणाचार्य,शास्त्री या समकक्ष योग्यता वालों को प्राथमिकता) ।

5.   यम-नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करना ।

6.   निष्काम भाव से समाज-राष्ट्र का सेवा का संकल्प होना । त्यागी,तपस्वी,सदाचारी होना ।

7.   अध्ययन काल में घर या स्वजनों से सांसरिक सम्बन्ध न होना ।

8.   अवस्था १८ वर्ष से अधिक होना ।

संस्थान की विशेषताएँ

1.   प्रत्येक ब्रह्मचारी को पक्षपात रहित (समान रूप से) भोजन,वस्त्र,दूध-घी,फल,पुस्तक,आसन इत्यादि सभी वस्तुएं निःशुल्क प्राप्त हैं ।

2.   प्रतिदिन कम से कम दो घण्टे व्यक्तिगत योगाभ्यास (ध्यान) करना अनिवार्य है ।

3.   प्रतिदिन क्रियात्मक योग प्रशिक्षण में विवेक,वैराग्य,अभ्यास,ईश्वर-प्रणिधान,मनोनियंत्रण,ध्यान,समाधि तथा स्वस्वामी-सम्बन्ध (ममत्व) को हटाना इत्यादि आध्यात्मिक सूक्ष्म विषयों पर विस्तार से विवेचन किया जाता है ।

4.   यम-नियमों का मनसा,वाचा,कर्मणा सूक्ष्मता से पालन कराया जाता है ।

5.   दिन में ५.३० घण्टे का मौन रहता है,जिसमें ध्यान,स्वाध्याय आदि सम्मिलित हैं।

6.   रात्रि में आत्म-निरीक्षण होता है जिसमें दिन भर के दोषों का सब के समक्ष ज्ञापन तथा भविष्य में सुधार हेतु प्रयत्न किया जाता है ।

7.   वार्तालाप का माध्यम संस्कृत भाष है ।

8.   प्रतिदिन यज्ञ,वेदपाठ तथा वेदमंत्र का स्वाध्याय होता है ।

9.   सप्ताह में एक बार आसन-प्रशिक्षण तथा समय-समय  पर व्याख्यान-प्रशिक्षण का भी अभ्यास कराया जाता है ।

10. दर्शनों की लिखित एवं मौखिक परिक्षाएं ली जाती है ।

11.  प्रातःकाल ४ बजे रात्रि ९-३० बजे तक आदर्श एवं व्यस्त गुरुकुलीय दिनचर्या है ।

विशेष – प्रवेश लेने वाले ब्रह्मचारियों का तीन मास तक बौद्धिक,आध्यात्मिक तथा व्यावहारिक परीक्षण किया जाता है । ब्रह्मचारी के योग्य सिद्ध होने पर ही स्थायी प्रवेश दिया जाता है ।